उकसावे की नीति से सियासी सफलता की उम्मीद

नवकांत ठाकुर (नजर और नजरिया, स्वतंत्र भारत)

भले ही लोकसभा चुनाव की समाप्ति के साथ ही सियासत के चूल्हे पर पकी सत्ता की जायकेदार खिचड़ी खुशनसीबों की थाली में परोसी भी जा चुकी हो, लेकिन राजनीतिक बावर्चीखाने के तापमान में गिरावट के आसार दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। हालांकि चुनाव के बाद राजनीतिक दलों द्वारा अमल में लाए जा रहे सियासत के स्वरूप में नाटकीय बदलाव अवश्य दिखाई पड़ रहा है। खास तौर से चुनावी जरूरतों से उबरने के बाद अब बदली हुई नीति, नीयत और स्वरूप में जो सियासत हो रही है उसमें तमाम राजनीतिक दलों द्वारा एक दूसरे पर सीधा हमला करने के बजाय एक दूसरे को उकसाने की कूटनीति पर अमल किया जा रहा है। इस रणनीति का मकसद भी बिल्कुल स्पष्ट है कि उकसावे में आकर विरोधी पक्ष ऐसी गलतियां कर बैठे जो उसके लिये सियासी तौर पर आत्मघाती साबित हो और अपनी बातों व हरकतों को जायज ठहराना उसके लिये नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो जाए। राजनीतिक उकसावे का यह तिलिस्मी मायाजाल फैलाने में ना तो सत्ता पक्ष पीछे है और ना ही विपक्ष। यहां तक कि इस मामले में सिर्फ सत्तापक्ष और विपक्ष की आमने-सामने नहीं हैं बल्कि दोनों खेमों के दल आपस में भी एक-दूसरे के खिलाफ इस रणनीति का इस्तेमाल करने से परहेज नहीं बरत रहे हैं।

सरकार की ओर से विपक्ष को उकसाने के लिये कश्मीर में विधानसभा सीटों के परिसीमन, धारा 370 और अनुच्छेद 35(ए) से जुड़े शगूफों का इस्तेमाल किया जा रहा है और जयश्रीराम के नारे का भी। नई शिक्षा नीति के खुराफाती प्रावधानों को भी आगे किया गया है और तेलंगाना व हैदराबाद को आतंकियों की सुरक्षित शरणस्थली बताने का सुर्रा भी छोड़ा गया है। नतीजन उकसावे के इस जाल में फंसकर पीडीपी सुप्रीमो महबूबा मुफ्ती ने कश्मीर को राजनीतिक विवाद करार देते हुए धारा 370 और अनुच्छेद 35(ए) के मसले को सुलझाने के लिये पाकिस्तान को भी पक्षकार के तौर पर वार्ता में आमंत्रित करने की मांग उठा दी है। इससे सरकार के लिये प्रखर राष्ट्रवाद के एजेंडे के तहत लोगों को यह समझाना काफी आसान हो गया है कि विपक्षी दल कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान के हितों की पैरोकारी कर रहे हैं। इसी प्रकार ‘जयश्रीराम’ के नारे का राजनीतिक इस्तेमाल किये जाने को लेकर ममता बनर्जी की चिढ़ व खीझ को उनकी हिन्दूविरोधी मानसिकता का परिचायक बताना और अपनी हिन्दुत्व के पैरोकार की छवि को मजबूत करना सत्तापक्ष के लिये आसान हो गया है। इसके अलावा नई शिक्षानीति में त्रिभाषा फार्मूले के तहत हिन्दी को अनिवार्य करने का सुर्रा छोड़कर गैर हिन्दीभाषी दक्षिण की सियासत में उबाल ला दिया गया है और वहां भी मोदी बनाम अन्य की जमीन तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही तेलंगाना और हैदाराबाद को आतंकवाद की शरणस्थली बताते हुए वहां के मुखर सांसद असदुद्दीन ओवैसी को उकसाने का नतीजा रहा कि वे राशन-पानी लेकर भाजपा पर चढ़ बैठे। नतीजन राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा के मसले पर सरकार के लिये यह बताना आसान हो गया कि इस मोर्चे पर उसकी नजर और पकड़ पूरी तरह मजबूत है। यानि समग्रता में समझें तो सिर्फ उकसावे की राह पकड़ कर राष्ट्रवादी, क्षेत्रवादी, सांप्रदायिक और भाषाई अस्मिता से जुड़े भावनात्मक व संवेदनशील मुद्दों पर सरकार ने बैठे-बिठाए अपनी बढ़त बना ली है।

विपक्षी खेमे में देखें तो बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी सपा के खिलाफ उकसावे की कूटनीतिक राह पकड़ते हुए लोकसभा चुनाव में यादव वोट नहीं मिलने और कथित तौर पर शिवपाल यादव द्वारा यादव मतदाताओं का वोट भाजपा की ओर मोड़ दिये जाने की बात कही है। मायावती के इस उकसावे के जाल में सपा महासचिव प्रो रामगोपाल यादव फंस गए और उन्होंने कह दिया कि अगर यादवों का वोट नहीं मिलता तो पिछली बार एक भी सीट नहीं जीत पानेवाली बसपा को इस बार दस सीटें नहीं मिलतीं। रामगोपाल का यह बयान मायावती की अपेक्षा के अनुरूप ही रहा है क्योंकि उनका प्रयास यही था कि गठजोड़ टूटने के बाद उनके परंपरागत मतदाताओं का सपा से पूरी तरह मोहभंग हो जाए। प्रो रामगोपाल के इस बयान ने दोनों दलों के परंपरागत मतदाताओं के बीच की सामाजिक खाई चैड़ी कर दी है जिसमें उन्होंने गठबंधन के बावजूद सपा को सिर्फ पांच सीटें मिल पाने और यादव परिवार के सदस्यों की हार की वजह मायावती के मतदाताओं द्वारा दगा किये जाने को बताया है।

दूसरी ओर सत्तापक्ष के भीतर जदयू और भाजपा के बीच एक-दूसरे को उकसाने की होड़ दिख रही है। केन्द्र की सत्ता में मनमुताबिक हिस्सेदारी नहीं मिलने से नाराज जदयू ने बिहार में तुरंत मंत्रिमंडल विस्तार करके भाजपा को ठेंगा दिया और नितीश कुमार ने महागठबंधन के सूत्रधारों में शुमार होनेवाले जीतनराम मांझी की इफ्तार पार्टी में शिरकत करके बिहार में भविष्य के लिये अपने राजनीतिक विकल्प खुले होने का इशारा कर दिया। नितीश के इस उकसावे पर इधर से उकसावे का तीर गिरिराज सिंह ने यह कह कर चला दिया कि काश इफ्तारी की ही तरह नवरात्री में फलाहारी का भी ऐसा ही भव्य आयोजन होता। हालांकि गिरिराज के बयान पर पार्टी अध्यक्ष की ओर से त्यौरियां चढ़ाने का दिखावा अवश्य किया गया लेकिन ना तो गिरिराज को बयान के लिये माफी मांगने का निर्देश दिया गया और ना ही उनको विवादित ट्वीट हटाने का निर्देश दिया गया।

समग्रता में समझें तो देश की मौजूदा सियासी तस्वीर में आमने-सामने के दंगल में पटखनी देने के बजाय सभी ने एक-दूसरे को पीछे से धक्का देकर गिराने की राह पकड़ी हुई है। लेकिन ऐसी कूटनीति में सबसे बड़ा खतरा यही रहता है कि दूसरे को पीछे से धक्का देकर गिराने का प्रयास करनेवाले को कई बार ‘मियां की जूती, मियां के सिर वाली स्थिति’ और ‘अपने खोदे गड्ढ़े में खुद ही गिरने की नौबत’ का भी सामना करना पड़ जाता है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’

Follow by Email
Facebook
Google+
http://samacharsansaar.com/%E0%A4%89%E0%A4%95%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%80-%E0%A4%B8">
Twitter

Comments are closed.