परम्परा, परिवार और प्रकृति प्रेम का पाठ पढ़ाता वटसावित्री

सोनी चौधरी

भारत को पर्व त्योहारों का देश माना गया है। भारत में मनाये जाने वाले प्रत्येक पर्व या त्योहार का कोई एक पक्ष नहीं रहता है। हर पर्व के पीछे इतिहास की ही कहानी नहीं होती है, बल्कि प्रकृति के संरक्षण, जीव कल्याण, सामाजिक समरसता और पारिवारिक भावना की पुष्टि का भी पाठ पढ़ाया जाता है। इसी क्रम में मैं आज वटसावित्री व्रत की चर्चा कर रही हूं। वटसावित्री व्रत सौभाग्य को देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना गया है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है। इस व्रत की तिथि को लेकर देश में भौगोलिक आधार पर भिन्नता है।स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है।तिथियों में भिन्नता होते हुए भी व्रत का उद्देश्य एक ही है सौभाग्य की वृद्धि और पतिव्रत के संस्कारों को आत्मसात करना। जिन क्षेत्रों यह अमावस्या को मनाया जाता है, वहां इस साल तीन जून को यह व्रत किया जायेगा।

धार्मिक पक्ष :

वट सावित्री व्रत में ‘वट’ और ‘सावित्री’ दोनों का विशिष्ट महत्व माना गया है। वट या बरगद के पेड़ का विशेष महत्व है।  ‘वट मूले तोपवासा’ । पुराणों में यह स्पष्ट किया गया है कि वट में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से मनोकामना पूरी होती है। वट वृक्ष अपनी विशालता के लिए भी प्रसिद्ध है। संभव है वनगमन में ज्येष्ठ मास की तपती धूप से रक्षा के लिए भी वट के नीचे पूजा की जाती रही हो और बाद में यह धार्मिक परंपरा के रूपमें विकसित हो गई हो।

दार्शनिक दृष्टि :

वट वृक्ष दीर्घायु व अमरत्व-बोध के प्रतीक के नाते भी स्वीकार किया जाता है। वट वृक्ष ज्ञान व निर्वाण का भी प्रतीक है। भगवान बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसलिए वट वृक्ष को पति की दीर्घायु के लिए पूजना इस व्रत का अंग बना। महिलाएँ व्रत-पूजन कर कथा कर्म के साथ-साथ वट वृक्ष के आसपास सूत के धागे परिक्रमा के दौरान लपेटती हैं।

पौराणिक कथा:

वट वृक्ष का पूजन और सावित्री-सत्यवान की कथा का स्मरण करने के विधान के कारण ही यह व्रत वट सावित्री के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सावित्री भारतीय संस्कृति में ऐतिहासिक चरित्र माना जाता है। भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी।उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं। अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। इसके बाद सावित्रीदेवी की कृपा से पुत्री का जन्म हुआ।कन्या का नाम सावित्री रखा गया।कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान थी। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा। सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहाँ साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया।नारद मुनि ने सावित्री से मिलकर सत्यवान से विवाह न करने की सलाह दी थी परंतु सावित्री ने सत्यवान से ही विवाह रचाया। पति की मृत्यु की तिथि में जब कुछ ही दिन शेष रह गए तब सावित्री ने घोर तपस्या की थी।कथा के अनुसार सावित्री ने अपने पति की प्राण रक्षा के लिए निराहार व्रत किया और विष्णु की आराधना करने लगी। अमावस्या के दिन सत्यवान का प्राण लेने यमराज आए, लेकिन सावित्री की भक्तिसे प्रसन्न होकर सौभाग्यवती होनेका आशीर्वाद दे दिया। जब यमराज पति का प्राण लेकर जाने लगे, तो वह पीछे लग गई। आखिरकार यमराज ने प्राण लौटाना पड़ा।पुराण, व्रत व साहित्य में सावित्री की अविस्मरणीय साधना की गई है।

व्रत का स्वरूप :

सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए वट सावित्री व्रत की पूजा करती है। इस दिन स्त्रियाँ अपने-अपने समूह में या अकेले ही आकर बरगद के पेड़ के पास अपने पति की लम्बी आयु के लिए पूजा-अर्चना करती है।उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को ही किया जाता है।ज्येष्ठ माह की अमावस्या को वट सावित्री व्रत के पूजन का विधान है। इस दिन महिलाएँ अपने सुखद वैवाहिक जीवन की कामना से वटवृक्ष की पूजा-अर्चना कर व्रत करती हैं। वट सावित्री व्रत में ‘वट’ और ‘सावित्री’ दोनों का विशेष महत्व माना गया है। वट सावित्री व्रत पूजन विधि में क्षेत्र के अनुसार कुछ अंतर पाया जाता है। प्रायः सभी भक्त अपने-अपने परम्परा के अनुसार वट सावित्री व्रत पूजा करते हैं। सामान्य पूजा के अनुसार इस दिन महिलाएँ सुबह स्नान कर नए वस्त्र पहनकर, सोलह श्रृंगार करती हैं। इस दिन निराहार रहते हुए सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष में कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं। वट पूजा के समय फल, मिठाई, पूरी, पुआ भींगा हुआ चना और पंखा चढ़ाती हैं । उसके बाद सत्यवान व सावित्री की कथा सुनती हैं। पुनः सावित्री की तरह वट के पत्ते को सिर के पीछे लगाकर घर पहुंचती हैं। इसके बाद पति को पंखा झलती है जल पिलाकर व्रत तोड़ती हैं।कच्चे सूत को हाथ में लेकर वे वृक्ष की बारह परिक्रमा करती हैं। हर परिक्रमा पर एक चना वृक्ष में चढ़ाती जाती हैं। और सूत तने पर लपेटती जाती हैं।परिक्रमा के पूरी होने के बाद सत्यवान व सावित्री की कथा सुनती हैं। उसके बाद बारह कच्चे धागा वाली एक माला वृक्ष पर चढ़ाती हैं और एक को अपने गले में डालती हैं। पुनः छः बार माला को वृक्ष से बदलती हैं, बाद में एक माला चढ़ी रहने देती हैं और एक स्वयं पहन लेती हैं। जब पूजा समाप्त हो जाती है तब स्त्रियाँ ग्यारह चने व वृक्ष की बौड़ी (वृक्ष की लाल रंग की कली) तोड़कर जल से निगलती हैं।इस तरह व्रत तोड़ती हैं।इसके पीछे यह मिथक है कि सत्यवान जब तक मरणावस्था में थे तब तक सावित्री को अपनी कोई सुध नहीं थी लेकिन जैसे ही यमराज ने सत्यवान को जीवित कर दिए तब सावित्री ने अपने पति सत्यवान को जल पिलाकर स्वयं वटवृक्ष की बौंडी खाकर जल ग्रहण की थी।

पर्यावरण संरक्षण का संदेश:

पति के दीर्घायु के लिए तो बरगद की पूजा की पौराणिक मान्यता अपनी जगह है ही। इसके पीछे पर्यावरण संरक्षण का भी बड़ा संदेश छिपा है। वनस्पतियों में बरगद को सबसे ज्यादा आयु के साथ सबसे ज्यादा छाया देने वाला भी पेड़ माना जाता है। पूजा के बहाने बरगद को सिंचने का भी मौका मिलता है, जिससे पर्यावरण की सुरक्षा होती है।अगर इसके धार्मिक महत्व को परे देखकर देखें, तो हमें ज्ञात होगा कि यह पूजा पर्यावरण से संबंधित है। इसमें महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं। भारतीयी संस्कृति में पेड़-पौधों को बहुत महत्व दिया गया है। संभवत: प्राचीन काल से ही लोग पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक थे। वे यह जानते थे कि अगर हमें अपनी धरती को सुरक्षित रखना है, तो पेड़-पौधों को संरक्षित करना पड़ेगा। इस सोच को मजबूती देने के लिए लोगों ने पेड़-पौधों को धर्म से जोड़ा। चूंकि, इंसान धर्म को बहुत महत्व देता है, इसलिए जिस भी पेड़ या पौधे का धार्मिक महत्व बताया गया है, लोग उसे काटते नहीं बल्कि उसे संरक्षित करते हैं। मसलन, पीपल, बरगद, करम, सखुआ, महुआ, तुलसी और केला जैसे अनगिनत पेड़ हैं, जिनकी पूजा का विधान भारतीय परंपरा में है। बावजूद इसके हमारी धरती से पेड़-पौधे कम हो गये हैं। यह एक चिंताजनक विषय है।

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