पहले से तय थी भाजपा में ‘शाह युग’ की समाप्ति?

नवकांत ठाकुर (नजर और नजरिया, स्वतंत्र भारत)

भाजपा का अध्यक्ष रहते हुए कार्यकर्ताओं की तादाद के लिहाज से इसे विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन बनाने और लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ केन्द्र की सत्ता में वापसी कराने में बड़ी भूमिका निभानेवाले अमित शाह का संगठन को छोड़कर सरकार में चले जाना कोई सामान्य घटना नहीं है। ऐसे फैसले अचानक, तत्काल या झटके में नहीं लिये जाते। वह भी भाजपा सरीखे ऐसे संगठन में जहां कोई भी बड़ा फैसला पार्टी अकेले नहीं ले सकती। बल्कि इसके हर बड़े निर्णय में मातृसंस्था यानि आरएसएस और सहोदर यानि आरएसएस के अन्य अनुषांगिक संगठनों की राय का निर्णायक महत्व रहता है। लिहाजा यह कहना गलत नहीं होगा कि शाह को संगठन से हटाकर किसी अन्य भूमिका में भेजे जाने का फैसला निश्चित तौर पर पहले ही लिया जा चुका था। चुंकि आम चुनाव के कारण बीते जनवरी में उनके कार्यकाल को छह माह के लिये आगे बढ़ा दिया गया था लिहाजा चुनावी नतीजे के बाद उन्हें प्रधानमंत्री मोदी का सहयोग करने के लिये केन्द्र में भेजना ही सबसे बेहतर विकल्प के तौर पर सामने आया।

हालांकि भाजपा के अध्यक्ष पद पर शाह के बरकरार रहने की तकनीकी संभावनाएं अभी मौजूद थीं और वे दोबारा पार्टी का अध्यक्ष बन सकते थे जहां इनका रूतबा वैसा ही है जैसा सरकार में मोदी का। बल्कि पार्टी का अध्यक्ष होने के नाते शाह की सरकार पर भी मोदी से कम पकड़ नहीं थी। लिहाजा स्वाभाविक है कि सीमित अधिकार के लिये सरकार में जाने के बजाय असीमित अधिकारों के साथ संगठन में ही बने रहना चाह रहे होंगे। लेकिन राजनाथ सिंह के बचे हुए ढ़ाई साल के कार्यकाल को पूरा करने के बाद अपना तीन साल का कार्यकाल पूरा कर चुके शाह को आगे फिर तीन साल के लिये अध्यक्ष बनाए जाने के प्रस्ताव पर लंबे समय से कई स्तरों पर चिंतन-मंथन चल रहा था। खास तौर से विचारणीय था कि सत्ता ही सर्वोपरि है या सिद्धांत व विचार। बेशक बहुतायत लोगों का मत सत्ता और विचारधारा के बीच संतुलन कायम करके आगे बढ़ने के पक्ष में ही सामने आया लेकिन संगठन को व्यक्तिवादी राजनीति से बाहर निकाल कर विचारों व सिद्धांतों को मजबूती देने की दिशा में आगे बढ़ाने का उपाय भगवा खेमे के शीर्ष रणनीतिकार अवश्य तलाशते रहे। इसके लिये आवश्यक था कि सरकार और संगठन की तारतम्यता की धुरी सत्ता के बजाय सिद्धांतों को बनाया जाए और जिन मसलों को प्रतीकात्मक तौर पर स्वीकार करके व्यावहारिक तौर पर उनसे दूरी बनाए रखने की नीति पर शाह के कार्यकाल में अमल किया जाता रहा उसमें बदलाव लाया जाए। ऐसी दिशा में आगे बढ़ा जाए ताकि पूरी भाजपा पिछलग्गू बन कर सिर्फ मोदी पर ही निर्भर ना रहे बल्कि पार्टी में फिर ऐसी शक्ति का संचार किया जाए जो मोदी का विकल्प भी प्रस्तुत कर सके।

इसके लिये पार्टी संगठन में आमूलचूल परिवर्तन करना आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य हो चला था। वैसे भी पार्टी अध्यक्ष के तौर पर अमित शाह की रीति-नीति और बातचीत के तौर-तरीकों से पूरे भगवा खेमे में अंदरखाने बेचैनी का माहौल था। अंदरूनी तौर पर एक बड़ा वर्ग इस बात से काफी नाराज था कि मौजूदा नेतृत्व के सुर में सुर नहीं मिलाने वाले को इस कदर हाशिये पर धकेल दिया जाता है जहां उसके विरोध का कोई मायने मतलब ही नहीं रह जाता। बेचैनी अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर ही नहीं है बल्कि संगठन के संचालन के तौर तरीकों को लेकर भी थी। व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन देने के क्रम में जिस तरह से विचारों और सिद्धांतों को किनारे कर दिया गया और मोदी के आगे पूरी पार्टी को नतमस्त, शरणागत व पिछलग्गू बना दिया गया है उससे वे लोग खासे असंतुष्ट थे जिनका मानना है कि व्यक्ति तो आते-जाते रहेंगे लेकिन विचार और सिद्धांत ही किसी संगठन को सदा-सर्वदा आगे बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा मोदी के हाथों में सरकार और शाह के कब्जे में संगठन के आ जाने से संगठन व सरकार का शीर्षतम पद एक ही सूबे यानि गुजरात से बंध गया जबकि अन्य दूसरे राज्यों व खास तौर से दक्षिणी व पूर्वी सूबों को संगठन व सरकार में दिखावे भर के लिये ही स्थान मिल सका। इसमें भी जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करते हुए जिन चेहरों को आगे किया गया उनमें से ज्यादातर आयातित और व्यक्तिवादी ही साबित हुए ना कि विचारधारावादी या सिद्धांतवादी। इसी प्रकार संगठन की सिफारिश पर सत्ता की मलाई के वितरण में वरिष्ठता और योग्यता की उपेक्षा करके मनमाने तरीके से ‘अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को दे’ की तर्ज पर व्यक्तिवादी तौर पर विश्वासपात्रों पर ही मेहरबानी दिखाने की परंपरा भी असंतोष का कारण बन रही थी। इसके अलावा व्यक्तिवाद की मजबूती के लिये सैद्धांतिक व वैचारिक विरोधियों को ठिकाने लगाने की नीति भी भगवा खेमे के उस वर्ग को रास नहीं आ रही थी जो व्यक्ति के कारण नहीं बल्कि विचारों व सिद्धांतों के कारण संगठन से जुड़ा हुआ है।

ऐसे तमाम मसले रहे जिसके कारण भगवा खेमे को यह फैसला लेना पड़ा कि भाजपा में आमूलचूल परिवर्तन होना ही चाहिये। वैसे भी शाह के अध्यक्ष पद पर बरकरार रहते हुए संगठन को व्यक्तिवाद की राह से हटाकर सिद्धांतों व विचारधारा की ओर मोड़ना संभव ही नहीं हो सकता था। लिहाजा भाजपा में ‘शाह-युग’ की समाप्ति की पटकथा पर मुहर लगाने के अलावा भगवा खेमे के पास दूसरा विकल्प ही नहीं बचा था। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’

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