बीती को बिसार कर आगे बढ़ने की जरूरत

नवकांत ठाकुर (नजर और नजरिया, स्वतंत्र भारत)

बड़े-बुजुर्ग बता गए हैं कि बेहिसाब खुशी या बेपनाह गम के माहौल में कोई बड़ा फैसला नहीं करना चाहिये। लिहाजा इस वक्त कांग्रेस के लिये बेहतर होगा कि कुछ समय के लिये वह सब कुछ वैसा ही चलने दे जैसा चलता आ रहा है। हालांकि इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि इस बार के चुनावों में कांग्रेस को जितनी करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है वह ना सिर्फ बेहद शर्मनाक बल्कि निहायत ही असहनीय भी है। कहने को भले ही पिछली बार के मुकाबले इस बार उसे आठ सीटें अधिक मिली हों लेकिन वास्तव में इस बार की हार हर मायने पिछली शिकस्त से अधिक दर्दनाक भी है और शर्मनाक भी। शर्मनाक इसलिये क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अमेठी की परंपरागत सीट पर ही शिकस्त का सामना नहीं करना पड़ा है बल्कि कुल अठारह सूबों में पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया है और उसके नौ पूर्व मुख्यमंत्रियों के अलावा राजस्थान के मौजूदा मुख्यमंत्री के बेटे भी जीत दर्ज कराने में नाकाम रहे हैं। इसके अलावा यह हार इसलिये भी दर्दनाक है क्योंकि कांग्रेस को इतनी सीटें भी नहीं मिल पाई हैं ताकि वह लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद पर अपनी दावेदारी पेश कर सके।

आंकड़ों में भले ही कांग्रेस ने अपने पिछले प्रदर्शन में सुधार किया हो लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह शिकस्त इस लिये असहनीय क्योंकि पिछली बार कांग्रेस के साथ कई कमजोरियां जुड़ी हुई थीं। दस साल तक लगातार सरकार चलाने के बाद उसे सत्ताविरोधी लहर का सामना करना पड़ा था। भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनआक्रोश को बुरी तरह भड़का दिया था। महंगाई अपने चरम पर थी। सरकार की नतिपंगुता जगजाहिर हो चुकी थी। चारों तरफ निराशा का माहौल था और गैरकांग्रेसवाद की आग हर तरफ सुलग रही थी। लेकिन इस बार ऐसा कोई बोझ कांग्रेस के कांधे पर नहीं था। एक तरफ मोदी सरकार के कार्यकाल में नोटबंदी की परेशानी, जीएसटी की समस्याओं और रोजगार रहित विकास के आंकड़ों ने आम जनमानस में एक विक्षोभ का वातावरण बनाया हुआ था वहीं राफेल के मामले ने भ्रष्टाचार की गुंजाइश और अंबानी, अडानी से लेकर बाबा रामदेव को मुहैया कराए गए मोटा माल कूटने के सुलभ माहौल का मसला भी चर्चा में था। यहां तक मंदिर मसले से लेकर गऊ रक्षा और धारा 370 सरीखे मूलभूत विचारधारा से जुड़े तमाम मामलों को लेकर भाजपा के परंपरागत व कट्टर मतदाताओं को भी कहीं ना कहीं ठगे जाने सरीखा एहसास सता रहा था। रही-सही कसर विपक्षी एकजुटता की आवश्यकता को लेकर बनी सर्वदलीय आमसहमति ने पूरी कर दी। उसमें भी सोने पर सुहागा यह कि इस बात की कोशिश सभी दल कर रहे थे कि कांग्रेस के साथ गठजोड़ करके ही चुनाव लड़ा जाए ताकि भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव टाला जा सके। कांग्रेस संगठन भी कुछ ही दिन पूर्व राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में जीत का झंडा गाड़ने में कामयाबी हासिल करने के बाद पूरी तरह आत्मविश्वास से लबालब था। यानी समग्रता में देखें तो इस बार ऐसा कोई कारण नहीं था जिसके दम पर मोदी सरकार की दोबारा वापसी की उम्मीद की जा सके।

लेकिन इन तमाम मुद्दों को भुनाने में हासिल हुई नाकामी और गठबंधन के मसले पर दिखाई गई हेकड़ी ने पूरा बेड़ा गर्क कर दिया। आलम यह रहा कि सीट बंटवारे का पेंच सुलझाने में नाकाम रहने के कारण यूपी, दिल्ली, पंजाब, चंडीगढ़ और हरियाणा से लेकर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान तक में कांग्रेस ना सिर्फ अकेली पड़ गई बल्कि चैतरफा हमलों के केन्द्र में भी आ गई। इसके अलावा अपने घोषणापत्र की सकारात्मक बातें लोगों तक पहुंचाने के बजाय मोदी सरकार पर जोरदार हमले की नकारात्मक राह पकड़ना भी कांग्रेस को भारी पड़ा और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को राफेल मामले में गलत तरीके से प्रस्तुत करने के बाद माफी मांगना भी कांग्रेस की विश्वसनीयता के लिये घातक रहा। कहा तो यह भी जा रहा है कि प्रियंका को सामने लाने के बाद उनका पूरा इस्तेमाल करने के बजाय अंतिम समय में उनको ना सिर्फ टिकट से वंचित करना बल्कि एक चेहरे के तौर पर स्थापित होने से उन्हें रोकना भी यही दर्शा रहा था कि कांग्रेस अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं है। ऊपर से मोदी पर किये गये निजी हमले, खुद को यूपी में ‘वोटकटवा’ घोषित कर देना और गैर-भाजपाई दलों के प्रति अपनाई गई ‘पल में तोला, पल में माशा’ की नीति ने भी कांग्रेस के प्रति आम लोगों में वितृष्णा और अविश्वास का भाव भर दिया। साथ ही राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में किसान कर्ज माफी के चुनावी वायदे को सही तरह से क्रियान्वित करने में हासिल नाकामी ने रही-सही विश्वसनीयता को भी धो दिया। नतीजन कांग्रेस ना तो विकल्प के तौर पर उभर सकी और ना ही जनअपेक्षाओं को पूरा कर पाने का विश्वास जगा सकी।

ऐसे में अब हार के बाद संवेदना और निराशा की धार बहाते हुए इस्तीफे का अंबार लगाने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। बेहतर होगा कि नीतिगत व कूटनीतिक कमियों व खामियों को पहचान कर उसे दूर किया जाए और भविष्य में उसे नहीं दोहराने का संकल्प लिया जाए। चुनाव में जीत-हार तो लगी ही रहती है। आवश्यक है कि अपनी सहजता और स्वाभाविकता को बरकरार रखा जाए और रचनात्मक व दूरगामी रणनीतियों पर अमल करके पार्टी की विश्वसनीयता और लोकप्रियता को दोबारा बहाल करने की कोशिश की जाए। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’

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