नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परपोते चंद्र कुमार बोस ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लिखा पत्र !

 नई दिल्ली, 26 दिसंबर 2025 ! नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार के सदस्यों, जिसमें नेताजी और शरत चंद्र बोस के वंशज शामिल हैं, ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर महान स्वतंत्रता सेनानी की विरासत और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के स्मरण हेतु आगे कदम उठाने का आग्रह किया है।

परिवार ने सरकार से नेताजी के सम्मान में और अधिक प्रयास करने की अपील की है। यह पत्र 24 दिसंबर को लिखा गया था, जिसमें नेताजी के पार्थिव अवशेषों को भारत वापस लाने की लंबे समय से चली आ रही मांग पर राष्ट्रपति के समर्थन की अपेक्षा व्यक्त की गई है। यह भावना वर्षों से इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) के पूर्व सैनिकों और परिवार के सदस्यों द्वारा भी दोहराई जाती रही है।

पत्र में कहा गया है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भूमिका और बलिदान को देश की भावी पीढ़ियों तक ससम्मान पहुँचाने के लिए ठोस और निर्णायक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। परिवार ने नेताजी की स्मृति को सुदृढ़ करने और उनके योगदान को उचित सम्मान देने के लिए सरकार से सहयोग की अपेक्षा जताई है।

चंद्र कुमार बोस ने लिखा, “मैं आपको शरत चंद्र बोस और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार के सदस्य के तौर पर यह पत्र लिख रहा हूँ और भारत की मौजूदा और आने वाली पीढ़ियों के लिए उनकी विरासत को और याद करने का एक प्रस्ताव आपके सामने रखना चाहता हूँ।”

नेताजी की पुत्री, प्रोफेसर अनीता बोस फैफ (Anita Bose Pfaff), अन्य पारिवारिक सदस्यों के साथ मिलकर लगातार भारत सरकार के समक्ष यह मुद्दा उठाती रही हैं और जापान के टोक्यो स्थित रेंकोजी मंदिर में रखे गए नेताजी के पार्थिव अवशेषों को भारत वापस लाने की मांग करती रही हैं।

पत्र में परिवार ने 21 अक्टूबर 2025 के ऐतिहासिक पड़ाव का भी उल्लेख किया है, जो सिंगापुर में नेताजी द्वारा आज़ाद हिंद की अस्थायी सरकार (प्रोविजनल गवर्नमेंट ऑफ आज़ाद हिंद) की स्थापना की 80वीं वर्षगाँठ को चिह्नित करता है।

पत्र में आगे कहा गया है, “जैसा कि आप जानते हैं, 21 अक्टूबर 2025 को हमने सिंगापुर में नेताजी द्वारा आज़ाद हिंद की अस्थायी सरकार की स्थापना के आठ दशक पूरे होने का स्मरण किया।

पत्र में आगे कहा गया है कि दिल्ली में किसी उपयुक्त स्थान पर इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) का एक स्मारक स्थापित करने की योजना, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ अंतिम संघर्ष में शामिल सैनिकों के सम्मान का प्रतीक होगी और नेताजी के प्रसिद्ध आह्वान “चलो दिल्ली” की स्मृति को भी पुनर्जीवित करेगी।

परिवार ने आशा व्यक्त की कि यह स्मारक न केवल आईएनए के सैनिकों को सम्मान देगा, बल्कि स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई में संघर्ष करने वालों के बलिदानों को भी स्थायी श्रद्धांजलि के रूप में स्मरण करेगा, जैसा कि नेताजी के ऐतिहासिक नारे “चलो दिल्ली” में निहित है।

पत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से नेताजी के पार्थिव अवशेषों को उनकी मातृभूमि भारत वापस लाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई करने की भावुक अपील भी की गई है, ताकि उनकी विरासत भारत की भावी पीढ़ियों के हृदय और मन में सुदृढ़ रूप से स्थापित रह सके। पत्र में राष्ट्रपति से विश्वास व्यक्त करते हुए कहा गया, “हम आपसे इस विषय में सकारात्मक कदम उठाने की अपील करते हैं।”

 

 

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