“आप व्यवस्था का मखौल बना रहे ” : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली, 3  November 2025 ! सुप्रीम कोर्ट ने आज, सोमवार को एक याचिकाकर्ता पर तीखी टिप्पणी की, जिसने स्वयं को हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किए जाने की मांग करते हुए याचिका दाखिल की थी। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की याचिकाएँ न्यायिक व्यवस्था की गरिमा और चयन-प्रक्रिया की गंभीरता का मजाक बनाती हैं।  मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता को फटकार लगते हुए कहा, “आप व्यवस्था का मखौल बना रहे हैं।“

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक नियुक्तियाँ इच्छा या याचिका के आधार पर नहीं, बल्कि संविधान में निर्धारित प्रक्रिया और योग्यता-मापदंडों के अनुसार की जाती हैं। कोर्ट ने इस तरह की याचिकाओं को “अस्वीकार्य और अनुचित” बताया तथा चेतावनी दी कि यदि इस प्रकार के आवेदन स्वीकार किए जाएँ, तो न्यायपालिका की साख पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। यह पूरे सिस्टम के लिए घातक उदाहरण बनेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता और योग्यता जैसे मूल सिद्धांतों को प्राथमिकता दी जाती है — केवल इच्छा-प्रकट करने से पद नहीं मिलता।

यह मामला उस वक़्त सुर्खियों में आया जब याचिकाकर्ता ने अनुरोध किया कि उसे High Court of XXX में न्यायधीश बनाया जाये। लेकिन कोर्ट को इस याचिका में मिला अनुरोध न्यायिक चयन प्रक्रिया-विधि की बजाय व्यक्तिगत इच्छा पर आधारित था। न्यायालय ने आगे निर्देश दिए कि इस तरह की याचिकाएँ स्वीकार्य नहीं, बल्कि योग्यता-आधारित आवेदन ही आगे बढ़ेंगे। न्यायमूर्ति ने कहा कि न्यायपालिका का काम ‘इच्छानुसार’ नहीं बल्कि नियम-परिभाषित प्रक्रियाओं के अनुरूप संचालित होना चाहिए।

अंत में, LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायालय ने कहा कि न्यायाधीश बनने की आकांक्षा रखना गलत नहीं, लेकिन इसके लिए कानूनी अनुभव, प्रतिष्ठा और चयन प्रक्रिया का सम्मान आवश्यक है। न्यायालय ने याचिकाकर्ता को स्पष्ट निर्देश दिए कि वह यदि वास्तव में न्यायधीश बनना चाहता है तो पहले न्याय-करणायोग्य अनुभव, योग्यता एवं चयन प्रक्रिया के नियमों को समझे और उन्हें पूरा करे — न कि इस तरह की याचिकाएँ दायर कर दृष्टांत बने कि न्यायपालिका व्यक्तिगत इच्छाओं का केंद्र है।

वहीं Deccan Chronicle ने बताया कि याचिकाकर्ता ने स्वयं को तेलंगाना उच्च न्यायालय में नियुक्त किए जाने का अनुरोध किया था।

खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए टिप्पणी की कि ऐसी प्रवृत्तियाँ “न्यायपालिका की गरिमा को आघात पहुँचाती हैं।“

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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